फ्रांस में भीषण गर्मी से बंद हुए न्यूक्लियर प्लांट, क्या भारत के परमाणु संयंत्रों पर भी मंडरा सकता है खतरा?
पेरिस
फ्रांस में तेज गर्मी का असर अब न्यूक्लियर पावर प्लांट पर भी दिखने लगा है. इस हफ्ते फ्रांस की सरकारी बिजली कंपनी EDF ने तीन न्यूक्लियर रिएक्टर बंद कर दिए और आठ अन्य रिएक्टरों का बिजली उत्पादन कम कर दिया. इसकी वजह उन नदियों का बढ़ता तापमान था, जिनके पानी से रिएक्टरों को ठंडा किया जाता है. इससे करीब 6.3 गीगावाट बिजली उत्पादन प्रभावित हुआ. इस घटना के बाद सवाल उठ रहा है कि क्या भारत के परमाणु बिजलीघरों के साथ भी कभी ऐसा हो सकता है।
न्यूक्लियर रिएक्टर बिजली बनाने के दौरान बहुत ज्यादा गर्मी पैदा करते हैं. इसलिए उन्हें लगातार ठंडा रखना जरूरी होता है. इसके लिए नदी, झील या समुद्र का पानी इस्तेमाल किया जाता है. फ्रांस में इस बार हीटवेव के कारण कई नदियों का पानी पहले से ही काफी गर्म हो गया. ऐसे में रिएक्टरों को पहले की तरह ठंडा करना मुश्किल होने लगा।
फ्रांस में गोलफेच (Golfech), बुजे (Bugey) और चूज (Chooz) न्यूक्लियर बिजलीघरों के तीन रिएक्टर बंद किए गए. वहीं आठ दूसरे रिएक्टरों का बिजली उत्पादन भी कम कर दिया गया. हालांकि किसी प्लांट में कोई तकनीकी खराबी या सुरक्षा से जुड़ी समस्या नहीं आई. फैसला सिर्फ इसलिए लिया गया ताकि गर्म पानी वापस नदी में छोड़ने से वहां का तापमान और न बढ़े।
न्यूक्लियर रिएक्टर को ठंडा रखना क्यों जरूरी है?
न्यूक्लियर रिएक्टर में यूरेनियम के परमाणु टूटने से गर्मी निकलती है. इसी गर्मी से भाप बनती है. टरबाइन घूमकर बिजली बनाती है. इसके बाद भाप को फिर से पानी में बदलना पड़ता है, ताकि यह प्रक्रिया लगातार चलती रहे. इसके लिए ठंडे पानी की जरूरत होती है।
अगर नदी का पानी पहले से ही ज्यादा गर्म हो, तो रिएक्टर की गर्मी उतनी आसानी से बाहर नहीं निकल पाती. इससे बिजली उत्पादन पर असर पड़ता है।
फ्रांस में रिएक्टर क्यों बंद करने पड़े?
फ्रांस के कई न्यूक्लियर पावर प्लांट गारोन, रोन और मीयूज जैसी नदियों के पानी से ठंडे होते हैं. इस बार हीटवेव के कारण इन नदियों का तापमान काफी बढ़ गया. फ्रांस में नियम है कि अगर प्लांट से निकलने वाला गर्म पानी नदी का तापमान तय सीमा, करीब 28 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंचा सकता है, तो बिजली उत्पादन कम करना या रिएक्टर बंद करना पड़ता है. ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि नदी में रहने वाली मछलियों और दूसरे जीवों को नुकसान न पहुंचे।
भारत में कितना है खतरा?
भारत में भी इस साल कई राज्यों में भीषण गर्मी पड़ी और बिजली की मांग 270 गीगावाट से ऊपर पहुंच गई. लेकिन भारत के ज्यादातर बड़े न्यूक्लियर पावर प्लांट फ्रांस जैसी स्थिति में आने की संभावना कम है।
कुडनकुलम, कलपक्कम और तारापुर जैसे बड़े परमाणु बिजलीघर समुद्र के किनारे बने हैं. ये समुद्र के पानी से ठंडे किए जाते हैं. समुद्र का तापमान नदियों की तुलना में बहुत धीरे बदलता है. इसलिए हीटवेव का असर वहां कम होता है।
रावतभाटा, नरोरा और काकरापार जैसे अंदरूनी इलाकों के प्लांट बड़े कूलिंग टावर का इस्तेमाल करते हैं. ये टावर गर्मी को हवा में छोड़ते हैं. इसलिए इन प्लांट्स में फ्रांस जैसी स्थिति बनने की संभावना कम रहती है।
भारत के सामने असली चुनौती क्या है?
भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता गर्म नदी नहीं, बल्कि पानी की कमी हो सकती है. कूलिंग टावर लगातार पानी इस्तेमाल करते हैं. अगर लंबे समय तक सूखा पड़ जाए और जलाशयों या नदियों में पानी कम हो जाए, तो बिजली उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
यानी फ्रांस की चिंता गर्म होती नदियां हैं, जबकि भारत के लिए सबसे बड़ा सवाल भविष्य में पानी की उपलब्धता है. इसलिए आने वाले समय में न्यूक्लियर पावर के साथ-साथ पानी का सही प्रबंधन भी उतना ही जरूरी होगा।


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